Monday, April 1, 2013

है था पुकारा छल को फिर
जब लुट रहा संसार था
ना थम सकी वो रात फिर
ना थम सका वो कारवां 

थे सब्र और संयम जुदा
और मिट रहे इंसान थे
क्या हश्र था इंसानियत का
जब रो रहे शैतान थे

थे मृत भी और कायर भी थे
जो वीरता से थे अपरिचित
शौर्य की तो क्या कहो
वो पुरुषत्व के गुण से थे वंचित

पर थे कहाँ वो,आँचल में क्या
आँचल में जीना क्या पाप था
देखा धरा ने एक आह से
अविनाशियों का अकाल था

पर थे अभी आँचल में भी
कुछ अंकुरित,नव पल्लवित
शौर्यता थी,वीरता थी
और शक्ति थी कुछ उल्लवित

फिर धरा ने देखा पलटकर
है कौन जो फिर उठ पड़ा
वो तो वही था,एक आदमी था
था फख्र से जो,फिर उठ खड़ा

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